हालात कैसे भी हो ,रहे शांत ।
June 18, 2018
शांत रहना उतना आसान नही है जितना की इसकी सलाह देना । लंदन मे बसे एक क्लिनिक साइकोथैरेपीस्त के पास इसके लिये कई टिप्स है ।
साथी के साथ झगड़ा होने के दौरान ।
सबसे पहले तो ऐसी किसी परिस्थिति से बचे रहने के लिये संवाद के सभी मार्ग खुले रखे । वैसे संबंधों मे तनाव किसी भी वजह से और कभी भी पैदा हो सकता है । ऐसा होने पर स्थिथि ठंडी पढ़ने पर एक -दूसरे के करीब आना एक कारगर उपाय है । साइकोलोजी मे इसे 'अनबन तथा सुधार ' कहते है ।
खेदजनक बातो वाली किसी भी बहस के बाद आप एक दूसरे को सुनते है ,जिम्मेदारी लेते है ,माफ करते है तथा माफी माँगते है और सब भूल कर आगे बढ़ते है ।
कोई भी संबन्ध अनबन रहित नही है परंतु महत्व इस बात का है कि आप उसमे सुधार किस तरह करते है ।
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जैसे ही आपको लगे कि आप अपना आपा खोने वाले है तो उस पारिस्थिति से खुद को बाहर कर ले ,टहलने निकल जाये तथा थोड़ा शांत होने के वाद लौट आये । घर की ही तरह कार्यस्थल पर भी 'अनबन तथा सुधार 'करना पड़ सकता है । क्योंकि घर से अधिक वक़्त हम दफ्तर मे गुजारते है तो वहाँ भी संबंधों का ध्यान रखना आवश्यक है ।
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साथी के साथ झगड़ा होने के दौरान ।
सबसे पहले तो ऐसी किसी परिस्थिति से बचे रहने के लिये संवाद के सभी मार्ग खुले रखे । वैसे संबंधों मे तनाव किसी भी वजह से और कभी भी पैदा हो सकता है । ऐसा होने पर स्थिथि ठंडी पढ़ने पर एक -दूसरे के करीब आना एक कारगर उपाय है । साइकोलोजी मे इसे 'अनबन तथा सुधार ' कहते है ।
खेदजनक बातो वाली किसी भी बहस के बाद आप एक दूसरे को सुनते है ,जिम्मेदारी लेते है ,माफ करते है तथा माफी माँगते है और सब भूल कर आगे बढ़ते है ।
कोई भी संबन्ध अनबन रहित नही है परंतु महत्व इस बात का है कि आप उसमे सुधार किस तरह करते है ।
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कार्यस्थल पर क्रोध आने पर
कार्यस्थल पर किसी का फोन पटकने ,चीलाने या क्रोध करना जल्दबाजी मे प्रतिक्रिया देने का नतीजा है । अपनी भावनाओ की सुन कर तथा आपा खोने के स्तर की ओर बढ़ने की पहचान करके इस तरह की प्रतिक्रिया से खुद को बचा कर रखा जा सकता है ।जैसे ही आपको लगे कि आप अपना आपा खोने वाले है तो उस पारिस्थिति से खुद को बाहर कर ले ,टहलने निकल जाये तथा थोड़ा शांत होने के वाद लौट आये । घर की ही तरह कार्यस्थल पर भी 'अनबन तथा सुधार 'करना पड़ सकता है । क्योंकि घर से अधिक वक़्त हम दफ्तर मे गुजारते है तो वहाँ भी संबंधों का ध्यान रखना आवश्यक है ।
तनाव तथा काम का बोज बढ़ जाने पर ।
यह पहचानना कि अब आप और काम नही कर सकते है एक शुरआत है । बेशक आपको खुद से उच्च अपेक्षाएं हो ,यह दिखावा करने की कोशिश ना करे कि आप सारा काम खुद कर सकते है । दूसरी बात है कि इनकार करना सीखना । जब काम बढ़ जाये तो प्रथामिकता तय करना तथा पक्का करना ज़रूरी हो जाता है कि आप प्रभावी ढंग से कार्य कर रहे है । हालांकि सबसे अच्छी व्यवस्था मे भी स्तिथि हाथ से फिसलने के स्तर पर पहुँच सकती है । जब महसूस हो कि काम का दबाव अधिक हो गया है तो कुछ वक़्त का ब्रेक ले । ब्रेक कितना भी छोटा क्यों ना हो ,बेहद लाभदायक सीध हो सकता है ।जब भविष्य को लेकर चिंता बढ़ जाये ।
जो चीजे आपके बस से बाहर है उन्हे स्वीकार करने का पूरा यत्न करे क्योंकि इनके बारे मे चिंता बेमानी है । आपका ध्यान चुनौतीयों से निपटने तथा ज़रूरत पढ़ने पर मदद का इंतजाम करने पर होना चाहिये ।Also read:
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